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What is unemployment? Types of unemployment in india?

Unemployment

Unemployment:- Poverty and unemployment remain the most prominent problems in our country at present.  These problems were present even before the independence of India and when India became independent, these problems are present in our society even after that. Although the government has run many schemes to deal with these problems, but at the ground level still these problems are present in our society.  weakening the country.

Now let us talk about the problem of unemployment because it is a very serious matter for a developing country like India.  In the present time, after the arrival of the epidemic like Kovid, this problem has taken a more formidable form.  Ever since the pandemic broke out, many people have been stripped of their jobs, which has had a greater impact on the people belonging to the lower income group and also on the workers who had left their state in search of employment in another state.

Definition of unemployment:-

Unemployment is said to exist when people willing to work at the prevailing wage rate cannot find employment.

The labor force population includes those people whose age is between 15 and 59 years.

There are two types of unemployment present in the context of India:-

Rural unemployment:– There is seasonal and disguised unemployment in rural areas.

urban areas:- there is mostly educated unemployment.

1. Seasonal unemployment:- When people are not able to get employment in some months of the year.  People dependent on agriculture usually face such problems.

2. Disguised unemployment:- Under this people appear to be employed.  This happens mainly in the families engaged in agricultural work.  5 people are needed in a work but 8 people are engaged in it, out of which three people are extra, even if those 3 people are removed, there will be no decrease in the productivity of the farm and the marginal productivity is zero.

3. Educated unemployment:- Many youths holding matriculation, graduate and postgraduate degrees are unable to get employment.  Unemployment among graduate and post graduate youth is increasing faster than in matriculation.

Problems of unemployment: –

Unemployment is a curse and a dangerous problem for any country because in this situation people do not have enough capacity to meet their normal needs, this usually leads to the problem of poverty.  Unemployment creates many problems for any country and thereby creates obstacles in the development of that country, which is very important to solve.  The following problems arise due to unemployment:-

Hunger problem

1. Unemployment leads to wastage of manpower resource.

2. A sense of hopelessness and despondency is created in the youth.

3. There is not enough money to maintain the family.

4. Unemployment increases the economic burden.

5. The dependence of unemployment on the working population increases.

6. There is a general decline in health status.

7. Increases isolation from the school system.

8. Unemployment has an adverse effect on the overall development of the economy.

Conclusion:- The increase in unemployment is an indicator of a slowing economy.  It also wastes resources that could have been usefully employed.  If people could not be used as a resource then naturally they would become a liability for the economy.

वर्तमान में गरीबी और बेरोजगारी हमारे देश में सबसे प्रमुख समस्याएं बनी हुई है। यह समस्याएं भारत की स्वतंत्रता से पहले भी विद्यमान थी और जब भारत स्वतंत्र हुआ तो उसके पश्चात भी यह समस्याएं हमारे समाज में विद्यमान है ।हालांकि सरकार ने इन समस्याओं से निपटने के लिए अनेको योजनाएं चला रखी है परंतु जमीनी स्तर पर अभी भी यह समस्याएं हमारे देश को कमजोर कर रही है।

अब हम बात करते हैं बेरोजगारी की समस्या पर क्योंकि भारत जैसे विकासशील देश के लिए बहुत ही गंभीर का विषय है। वर्तमान समय में कोविड जैसी महामारी के आने के पश्चात इस समस्या ने और भी विकराल रूप धारण कर लिया है। जब से महामारी फैली है तब से अनेकों लोगों से उनके रोजगार छीन गए है जिसका असर निम्न आय वर्ग के लोगों पर अधिक पडा है और उन श्रमिकों पर भी अधिक पड़ा है जो अपने राज्य को छोड़कर किसी दूसरे राज्य में रोजगार की तलाश में आए थे।

बेरोजगारी की परिभाषा:-

बेरोजगारी उस समय विद्यमान कही जाती है जब प्रचलित मजदूरी की दर पर काम करने के लिए इच्छुक लोग रोजगार नहीं पा सकते।

श्रम बल जनसंख्या में वे लोग शामिल किए जाते हैं जिनकी उम्र 15 से 59 वर्ष के बीच हो।

भारत के संदर्भ में दो तरह की बेरोजगारी उपस्थित है:-

ग्रामीण बेरोजगारी:- ग्रामीण क्षेत्रों में मौसमी और प्रच्छन्न बेरोजगारी है।

नगरीय क्षेत्र:- में अधिकांशत शिक्षित बेरोजगारी है।

1. मौसमी बेरोजगारी:- जब लोग वर्ष के कुछ महीनों में रोजगार प्राप्त नहीं कर पाते है। कृषि पर आश्रित लोग आमतौर पर इस तरह की समस्याओं से जूझते हैं।

2. प्रच्छन्न बेरोजगारी:- इसके अंतर्गत लोग नियोजित प्रतीत होते हैं। ऐसा मुख्यता कृषिगत काम में लगे परिजनों में होता है। किसी काम में 5 लोगों की आवश्यकता है लेकिन इसमें 8 लोग लगे होते हैं उनमें तीन लोग अतिरिक्त हैं अगर उन 3 लोगों को निकाल भी दिया जाए तो खेत की उत्पादकता में कोई कमी नहीं आएगी और सीमांत उत्पादकता शून्य होती है।

3. शिक्षित बेरोजगारी:- मैट्रिक, graduate और स्नातकोत्तर डिग्री धारक अनेक युवक रोजगार पाने में असमर्थ है। मैट्रिक की तुलना में स्नातक और स्नातकोत्तर युवकों में बेरोजगारी अधिक तेजी से बढ़ रही है।

बेरोजगारी की समस्याएं:- बेरोजगारी किसी भी देश के लिए अभिशाप और खतरनाक समस्या है क्योंकि इस स्थिति में लोगों के पास इतनी क्षमता नहीं होती कि वह अपनी सामान्य जरूरतों को भी पूरा कर पाते इससे गरीबी की समस्या अमूमन पैदा हो जाती है। बेरोजगारी से किसी भी देश के लिए अनेकों समस्याएं उत्पन्न हो जाती है और जिससे उस देश के विकास में रुकावटे पैदा हो जाती है जिनका समाधान करना अति आवश्यक है। बेरोजगारी के कारण निम्नलिखित समस्याएं उत्पन्न होती है:-

1. बेरोजगारी से जन शक्ति संसाधन की बर्बादी होती है।

2. युवकों में निराशा और हताशा की भावना पैदा होती है।

3. परिवार का भरण पोषण करने के लिए प्रयाप्त मुद्रा नहीं होती।

4. बेरोजगारी से आर्थिक बोझ में वृद्धि होती है।

5. कार्यरत जनसंख्या पर बेरोजगारी की निर्भरता बढ़ती है।

6. स्वास्थ्य स्तर में एक आम गिरावट आती है।

7. स्कूल प्रणाली से अलगाव में वृद्धि होती है।

8. अर्थव्यवस्था के समग्र विकास पर बेरोजगारी का दुष्प्रभाव पड़ता है।

निष्कर्ष:- बेरोजगारी में वृद्धि मंदीग्रस्त अर्थव्यवस्था का सूचक है। यह संसाधनों की बर्बादी भी करता है जिन्हें उपयोगी ढंग से नियोजित किया जा सकता था। अगर लोगों को संसाधन के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सका तो स्वाभाविक रूप से अर्थव्यवस्था के लिए दायित्व बन जाएंगे।